शाम का वक्त था। मैं रोज़ की तरह थकी-हारी काम से घर लौटी।
दरवाज़ा खोला ही था कि ऊपर से अपनी छोटी सी बेटी के ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ सुनाई दी।
उसकी चीखें सीढ़ियों में गूंज रही थीं।
दिल धक से बैठ गया।
मैं बिना एक पल गँवाए ऊपर भागी।
कमरे में पहुँची तो देखा – मेरी बेटी का चेहरा लाल था, वह पसीने से भीग चुकी थी और उसका मुँह भूख से फूला हुआ था।
उसके पास रखी दूध की बोतल खाली थी।
लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि उसके बगल में छोटा आरव – मेरे पति का बेटा – दूध के बड़े डिब्बे से गटक-गटक कर पी रहा था।
वही दूध का डिब्बा जो मैंने कल ही अपनी बेटी के लिए खरीदा था।
मेरी आँखें चौड़ी रह गईं।
कुछ दिनों से देख रही थी कि मेरी बच्ची दिन-ब-दिन दुबली होती जा रही है, रात-रात भर भूखी रोती रहती है।
मुझे लगता था शायद उसका शरीर कमज़ोर है।
लेकिन अब असली सच्चाई मेरे सामने थी – उसका हिस्सा, उसका हक़, कोई और छीन रहा था।
उसी वक्त रसोई से मेरी सास कमला आईं।
उन्होंने मुझे खड़ा देखा तो ज़रा भी घबराई नहीं, बल्कि तुनक कर बोलीं:
“हाँ… अभी आरव को दूध पिला रही थी। बेटी तो थोड़ा कम भी पी ले तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता।”
मेरे कान गूंज उठे।
मैं काँपती आवाज़ में बोली:
“ये दूध मैंने अपनी बेटी के लिए खरीदा था! आप कैसे उसका हक़ किसी और को दे सकती हैं?”
कमला ने ठुड्डी ऊँची कर ली और ठंडी आवाज़ में कहा:
“बेटी के लिए इतना सोचने की ज़रूरत नहीं। वो तो पराया धन है। असली वारिस तो पोता है। उसे मज़बूत बनाना ज़रूरी है।”
मेरे दिल में जैसे किसी ने छुरा घोंप दिया।
मेरी गोद में पड़ी बच्ची की रोती हुई लाल आँखें मुझे चीर रही थीं।
मैंने उसे सीने से कसकर चिपका लिया।