नंदिनी ने गुस्से से कहा,
“सम्मान देना और लेना दोनों तरफ़ से होता है। आप लोगों ने जो बोला, वो क्या सही था?”
आकाश ने ऊँची आवाज़ में कहा,
“बस, अब और नहीं। ज़्यादा जबान मत चलाओ। चुपचाप माफ़ी माँग लो वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा।”
नंदिनी की आँखों में आँसू थे लेकिन आवाज़ मज़बूत थी।
“वरना? वरना क्या कर लोगे? हाथ उठाओगे? कोशिश करना आकाश, इस बार मेरा हाथ भी उठेगा।”
ये सुनकर आकाश सन्न रह गया।
सुनीता जी और काजल ने अपने सिर पर हाथ रख लिया।
“हे भगवान… अपने पति को धमकी दे रही है। कैसा कलयुग आ गया है।”
नंदिनी ने दृढ़ आवाज़ में कहा,
“कलयुग नहीं आया है मम्मी जी, बस सच बोलने की हिम्मत आई है। एक साल से सब कुछ सह रही हूँ। अब और नहीं।
आपको लगता है कि मायके वाले ग़रीब हैं तो उन्हें अपमानित कर सकते हैं। लेकिन मैं चुप नहीं रहूँगी। मेरे माता-पिता ने हमेशा सम्मान दिया है। छोटी सी बात का मज़ाक उड़ाना और ताने मारना बंद कीजिए।
अगर मायके की छोटी सी गलती अपमान है, तो सोचिए यहाँ रोज़ मेरा क्या अपमान होता है।”
पूरा हॉल खामोश हो गया।
आकाश को भी समझ आ गया कि मामला उसकी सोच से कहीं आगे बढ़ चुका है।
नंदिनी रोते हुए बोली,
“सम्मान दोगे तो सम्मान मिलेगा। वरना आज जैसा हुआ, वही रोज़ होगा।”
इतना कहकर नंदिनी कमरे में चली गई।
आकाश ने माँ और बहन की ओर देखा और धीरे से कहा,
“माँ… शायद गलती हमारी भी है। छोटी-छोटी बातों को इतना बढ़ा देना सही नहीं था।”
काजल और सुनीता जी चुप रह गईं।
आकाश धीरे-धीरे नंदिनी के कमरे की तरफ़ बढ़ा।