हॉल में पहले से ही आकाश की माँ सुनीता जी और बहन काजल बैठी थीं।
दोनों के चेहरों पर अजीब सी मुस्कान थी, जैसे उनकी जीत हो गई हो।
नंदिनी ने धीरे से उठते हुए अपना दुपट्टा संभाला और शांत स्वर में पूछा,
“क्या बात है आकाश, क्यों इतना चिल्ला रहे हो?”
आकाश और भड़क गया।
“कितनी बेशर्म औरत हो तुम। घर में इतना तमाशा हो गया तुम्हारे कारण और तुम्हें ज़रा भी शर्म नहीं आ रही।”
“ऐसा क्या कर दिया मैंने?”
नंदिनी ने सहजता से कहा।
“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी माँ और बहन को पड़ोस की औरतों के सामने नीचा दिखाने की। अभी के अभी माफ़ी माँगो, वरना ये घर छोड़ना पड़ेगा।”
नंदिनी की आवाज़ अब थोड़ी तेज़ हो गई।
“माफ़ी? और मैं क्यों माफ़ी माँगूँ?
कल जब पड़ोस की औरतें बैठी थीं तो तुम्हारी माँ और बहन मेरे मायके वालों के लिए कैसी बातें कर रही थीं, वो नहीं बताया तुमने? उन्हें गँवार, जाहिल कह रही थीं। और तुम्हें लगता है मैं चुप रहूँ?”
सुनीता जी बीच में बोलीं,
“हे भगवान… देखो कैसी जबान चला रही है। यही संस्कार दिए हैं इसके माता-पिता ने। बहुएँ तो घर की बातों को छुपाती हैं और ये? सबको बता रही थी कि इसके मायके से केवल पाँच सौ रुपये का शगुन आया। और तो और कह रही थी कि वहाँ बस साधारण खाना मिला। इतनी शर्म भी नहीं आई इसे।”
नंदिनी ने पलट कर कहा,
“तो क्या गलत कहा मैंने? सच ही तो कहा था। और वैसे भी आप लोगों ने ही तो पड़ोसियों के सामने मेरे मायके वालों को छोटा दिखाना शुरू किया था।”
काजल ने तुरंत जोड़ दिया,
“हाँ, और सच ये भी है कि तुम्हारे पापा ने कभी हमें ढंग से सम्मान नहीं दिया। ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे हम पर कोई एहसान कर रहे हों।”