सुबह की धूप आँगन में फैल रही थी। राधा ने जल्दी-जल्दी बच्चों का टिफ़िन तैयार किया और पति मनोज के लिए नाश्ता परोसा। जैसे ही सब अपने-अपने कामों के लिए निकल गए, घर में सिर्फ़ दो लोग रह गए — राधा और उसकी सास कमला देवी।
कमला देवी उम्रदराज़ थीं। चश्मा लगाए धीमी चाल से घर का काम सँभालतीं, लेकिन उनका दिल हर रोज़ एक बोझ लेकर जीता था। पेंशन का मामूली सा सहारा था, उससे दवा-पानी और ज़रूरी खर्च निकल तो जाता, मगर उनके मन की इच्छाएँ अक्सर वहीं दब जातीं।
राधा ने कई बार देखा था कि सास किसी विज्ञापन को टीवी पर देखतीं तो उनकी आँखों में चमक आ जाती, पर अगले ही पल वो नज़रें झुका लेतीं। मोहल्ले की औरतें जब मिलकर मंदिर जातीं या कभी बाज़ार घूम आतीं, तो कमला देवी बस चुपचाप कह देतीं —
“मुझे घर का काम है, तुम लोग जाओ।”
लेकिन राधा समझती थी कि असली वजह घर का काम नहीं बल्कि जेब की मजबूरी थी।
पहला संकेत
एक दिन जब दूधवाला पैसे लेने आया, राधा ने दरवाज़े से झाँककर देखा कि कमला देवी पर्स में से सिक्के गिन रही थीं। आख़िरकार, उन्होंने एक रुपए का सिक्का बच्चों की गुल्लक से निकाला और दूधवाले को दे दिया। उस क्षण राधा का दिल काँप उठा।
वो सोचने लगी “क्या मेरी सास का जीवन बस सिक्कों में सिमटकर रह जाएगा? क्या उन्होंने पूरी उम्र सिर्फ़ कर्तव्यों के लिए ही गुज़ार दी, अपनी इच्छाओं के लिए कभी कुछ नहीं?”
राधा का निर्णय
उस रात जब सब सो गए, राधा चुपचाप बैठी रही। उसके मन में बार-बार माँ जैसी सास की छवि घूम रही थी। उसने ठान लिया कि वो उन्हें केवल “गुज़ारे” तक सीमित नहीं रहने देगी, बल्कि उन्हें जीने का नया हक़ देगी।
अगले दिन, जब मनोज ऑफिस चला गया और बच्चे स्कूल, राधा ने अपने पर्स से कुछ नोट निकाले और माँ के कमरे में गई।
“माँ जी, ये रख लीजिए।”
कमला देवी चौंक पड़ीं।
“अरे! ये क्या है राधा? मुझे क्यों दे रही हो पैसे?”
राधा मुस्कुराई —
“माँ, ये आपके अपने खर्च के लिए हैं। आप चाहें तो अपनी पसंद का कुछ खरीद लें, मंदिर जाएँ, या सहेलियों के साथ सिनेमा देखने निकलें। जो आपका मन चाहे।”
कमला देवी की आँखें भर आईं।
“बिटिया, मुझे इनकी ज़रूरत नहीं है। तेरे ससुर जी की पेंशन से गुज़ारा हो जाता है।”
राधा ने माँ का हाथ अपने माथे से लगाया और धीरे से बोली —
“माँ, गुज़ारा और जीना दोनों अलग बातें हैं। आपने हमेशा दूसरों की खुशी के लिए अपना मन दबाया। अब वक्त है कि आप अपनी खुशी को भी जगह दें। आपके पास भी हक़ है कि आप सिर्फ़ ‘गुज़ारे’ से ऊपर जीएँ।”