कमला देवी उम्रदराज़ थीं। चश्मा लगाए धीमी चाल से घर का काम सँभालतीं, लेकिन उनका दिल हर रोज़ एक बोझ लेकर जीता था।

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छुपा हुआ दर्द

इतना सुनकर कमला देवी का दिल पिघल गया। उन्होंने काँपते हाथों से नोट थामे और बोलीं —
“बेटा, तूने मेरे दिल की बात पहचान ली। मैं कब से चाहती थी कि एक बार अपने लिए अपनी पसंद की साड़ी लूँ, या कभी बर्फ़ी खाकर देखूँ जैसे पहले खाया करती थी। पर हर बार मैंने सोचा कि ये सब फ़िज़ूल है। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी अपने लिए नहीं जिया।”

राधा ने उन्हें गले से लगा लिया।
“माँ, अब आपकी बेटी (बहू नहीं, बेटी) कह रही है — आप अपनी ज़िंदगी अपने मन से जिएँ। जब आप खुश रहेंगी तभी घर भी रोशन रहेगा।”

बदलाव की शुरुआत

धीरे-धीरे घर में बदलाव आने लगा।

कमला देवी अब मोहल्ले की सहेलियों के साथ कभी मंदिर जातीं, कभी बाज़ार। पहली बार उन्होंने अपनी पसंद की हल्की गुलाबी रंग की साड़ी खरीदी। जब वो उसे पहनकर आईं तो राधा ने तालियाँ बजाकर कहा —
“माँ, आज तो आप हम सब से ज़्यादा सुंदर लग रही हैं।”

कमला देवी की आँखों में शर्मीली खुशी थी। वर्षों बाद उन्हें महसूस हुआ कि वो भी औरों की तरह अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकती हैं।

पति की प्रतिक्रिया

एक दिन मनोज ने माँ को नई साड़ी पहने देखा। वो हँसकर बोला —
“अरे माँ! ये तो आप पर बहुत जँच रही है। लेकिन खरीदी कैसे? पेंशन तो उतनी ही है?”

कमला देवी ने चुपचाप राधा की ओर देखा। राधा मुस्कुराई और बोली —
“मैंने दिए थे पैसे, ताकि माँ भी अपनी पसंद का सामान ले सकें। अब वो सिर्फ़ माँ ही नहीं, इंसान भी हैं।”

मनोज की आँखें नम हो गईं। उसने पत्नी का हाथ दबाया और बोला —
“राधा, तूने वो किया जो मैं कभी सोच भी नहीं पाया। माँ ने हमें हमेशा दिया, और हम सोचते रहे कि बस यही काफ़ी है। पर तूने माँ को उनका हक़ लौटाया — जीने का हक़।”

अनकहा रिश्ता

धीरे-धीरे सास-बहू का रिश्ता और गहरा होता गया। लोग कहते — “कमला देवी की किस्मत है जो इतनी समझदार बहू मिली।”

पर कमला देवी जानती थीं कि ये किस्मत नहीं, राधा का दिल है। एक दिल जिसने रिश्तों को कर्तव्यों से ऊपर रखा और इंसान की असली ज़रूरत — सम्मान और आज़ादी — को पहचान लिया।

कहानी का अंत

एक शाम जब सब छत पर बैठे थे, कमला देवी ने अचानक कहा —
“राधा, मैं तुझे अपनी बहू नहीं, अपनी बेटी मानती हूँ। आज तक लोग कहते थे कि बहुएँ सास को बाँध देती हैं, पर तूने मुझे आज़ाद कर दिया।”

राधा ने माँ का हाथ थाम लिया।
“माँ, मैंने सिर्फ़ वही किया जो हर बहू को करना चाहिए। हम औरतें अगर एक-दूसरे की इच्छाओं को समझें और उन्हें जीने का मौका दें, तो घर अपने आप खुशियों से भर जाएगा।”

कमला देवी की आँखों में आँसू थे, लेकिन होंठों पर मुस्कान। अब उनका चेहरा हल्का और आज़ाद लग रहा था — जैसे उन्होंने सचमुच जीने का हक़ पा लिया हो।

Ankit Verma

अंकित वर्मा एक रचनात्मक और जिज्ञासु कंटेंट क्रिएटर हैं। पिछले 3 वर्षों से वे डिजिटल मीडिया से जुड़े हैं और Tophub.in पर बतौर लेखक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। लाइफस्टाइल, टेक और एंटरटेनमेंट जैसे विषयों में विशेष रुचि रखते हैं।

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