शादी और सन्नाटा
शादी चुपचाप हुई। न सजी हुई मण्डप, न फूल, न मेहमान। बस एक दस्तख़त, और अंजलि का नाम “श्री शर्मा” के साथ जुड़ गया।
पहली रात… अंजलि डरते-डरते उनके कमरे में गई। दिल धड़क रहा था। उसने खुद को सबसे बुरे के लिए तैयार कर लिया था।
लेकिन… श्री शर्मा ने उसे छुआ तक नहीं। बस अपनी व्हीलचेयर पर बैठे रहे, और कोमल आवाज़ में कहा –
“मेरी बच्ची, डर मत। आओ, बैठो मेरे पास।”
अंजलि हैरान रह गई।
अजनबी से अपनापन
दिन बीतते गए। और धीरे-धीरे अंजलि ने देखा कि श्री शर्मा उसके साथ पति जैसा नहीं, बल्कि एक संरक्षक जैसा व्यवहार करते हैं।
वो उसके साथ बैठते, अपनी ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव सुनाते। कहते –
“तुम पढ़ाई मत छोड़ना। मैं तुम्हारे लिए ट्यूटर रखवाऊँगा।”
वो उसकी सेहत का ख्याल रखते, पूछते कि उसने खाना खाया या नहीं। हवेली, जो पहले वीरान थी, अब अंजलि की हँसी से गूँजने लगी।
अंजलि को धीरे-धीरे एहसास हुआ – यह बुज़ुर्ग आदमी कठोर या लालची नहीं था। बल्कि बेहद दयालु और संवेदनशील था।
एक दिन हिम्मत करके उसने पूछा –
“आप इतने मेहरबान क्यों हैं? मैंने तो सोचा था…”
श्री शर्मा ने उदास मुस्कान दी –
“मेरी तीनों पत्नियाँ जल्दी चली गईं। मैं जानता हूँ जबरदस्ती और अकेलेपन का दर्द क्या होता है। मैं तुम्हें वही नहीं झेलने दूँगा।”
अंजलि की आँखें भर आईं। उसके दिल में सम्मान और कृतज्ञता ने जगह बना ली।