
गाँव में एक बूढ़ी औरत थी, जिसे लोग देवी का स्वरूप मानते थे। उसने ही एक दिन वीरेंद्र से कहा “तू कोई साधारण लड़का नहीं, तेरी नसों में राजाओं का खून दौड़ रहा है। जिस गद्दी पर अब बैठा है गद्दार, उस पर बैठने का हक़ तेरा है।” ये सुनते ही वीरेंद्र के भीतर दबा हुआ तूफ़ान फूट पड़ा।
धीरे-धीरे सच सामने आने लगा। उसे पता चला कि उसके पिता रणधीर सिंह की हत्या उसके ही चाचा भैरव सिंह ने की थी। अमरगढ़ की जनता अब भी गुलामी में कराह रही थी। सोना-चाँदी भैरव सिंह के खजाने में जाता और जनता भूख से तड़पती। महल में जलसे और नीचे ग़रीबी की चीखें गूंजतीं।
वीरेंद्र ने कसम खाई कि वो अपनी माँ की कुर्बानी और पिता के लहू का बदला लेगा। उसने अपनी पहचान छुपाकर सैनिकों में जगह बनाई। अपनी ताक़त और जिगर से उसने धीरे-धीरे लोगों का दिल जीतना शुरू कर दिया। गाँव-गाँव में उसका नाम गूंजने लगा। लोग उसे अपना तारणहार मानने लगे।
एक दिन अमरगढ़ के अखाड़े में विशाल रथों की प्रतियोगिता हुई। भैरव सिंह ने ऐलान किया कि जो इसे जीतेगा, वही उसका खास सेनापति बनेगा। वीरेंद्र ने हिस्सा लिया। जब उसने अकेले दम पर सौ सिपाहियों को धूल चटा दी और रथ को एक हाथ से पलट दिया, तब पूरा महल कांप उठा। भैरव सिंह को भी समझ में आ गया कि ये कोई साधारण आदमी नहीं है। लेकिन वह ये नहीं जान पाया कि ये वही है जिसे वो कभी मार नहीं सका।