पहाड़ों के बीच बसा एक प्राचीन राज्य था अमरगढ़। कहते हैं कि इस राज्य की धरती सोने जैसी उपजाऊ और इसके किले लोहे जैसे मज़बूत थे। अमरगढ़ के राजा रणधीर सिंह न्यायप्रिय और प्रजावत्सल थे। जनता उन्हें भगवान का रूप मानती थी। उनकी रानी मृणालिनी जितनी सुंदर थीं उतनी ही साहसी भी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। रणधीर सिंह का छोटा भाई भैरव सिंह महत्वाकांक्षी और लालची था। उसे गद्दी चाहिए थी, चाहे इसके लिए खून ही क्यों न बहाना पड़े।
एक रात षड्यंत्र रचा गया। जब रणधीर युद्ध से लौटे तो उनके ही भाई ने महल के भीतर तलवार खींच ली। वफ़ादार सैनिकों की आँखों के सामने राजा की हत्या कर दी गई। रानी मृणालिनी गर्भवती थीं। उन्होंने किसी तरह महल से भागकर अपने अजन्मे बच्चे को बचाया। पीछा करते हुए सैनिकों ने उन्हें घेर लिया, लेकिन अपनी आख़िरी सांस तक लड़ते हुए उन्होंने अपने बेटे को नदी में बहा दिया। रानी तो मर गईं, लेकिन बच्चा भाग्य से बच गया।
वो बच्चा था वीरेंद्र। नदी के किनारे बसे एक साधारण चरवाहे ने उसे पाया और अपनी औलाद की तरह पाला। वीरेंद्र ने बचपन से ही ऐसी ताक़त दिखाई कि गाँव वाले उसे चमत्कार मानते थे। पहाड़ पर चढ़ना, नदी की लहरों से लड़ना, और जंगली जानवरों को मात देना उसके लिए खेल था। पर उसे हमेशा लगता कि उसके खून में कोई रहस्य छिपा है। जब भी आसमान में गरजती बिजली को देखता, उसके भीतर आग सी जल उठती।