घर पर भी समस्याएँ थीं। पत्नी गौरी, दो छोटे बच्चे और बूढ़े माता-पिता। बच्चों की पढ़ाई का खर्च, घर का किराया और दवाइयों का बोझ सब कुछ उसी पर था। गौरी उसे हिम्मत बंधाती—
“तुम चिंता मत करो अजय। ईमानदारी का रास्ता कठिन होता है, लेकिन जीत अंत में उसी की होती है।”
अजय मन ही मन सोचता कि पत्नी और बच्चों की खातिर कहीं समझौता कर ले, लेकिन आत्मा उसे रोक देती।
एक दिन अचानक उसका तबादला कर दिया गया। नई जगह जाना आसान नहीं था। बच्चों का स्कूल छूट जाता, गौरी को भी बार-बार शहर बदलना पड़ता। उसने तय किया कि वह बच्चों की पढ़ाई बीच में नहीं रोकेगी।
“तुम अकेले चले जाओ अजय। मैं यहीं रहकर बच्चों की देखभाल करूँगी।”
अजय का दिल भारी हो गया। परिवार से दूर रहना कठिन था, लेकिन वह मजबूर था।
नई जगह पर भी वही कहानी दोहराई गई। वहाँ भी भ्रष्टाचार का बोलबाला था। अजय ने अपना काम ईमानदारी से शुरू किया। लेकिन उसकी छवि पहले से पहुँच चुकी थी—“ये वही आदमी है जो गलत पर साइन नहीं करता।”
धीरे-धीरे उसके खिलाफ फिर साजिश रची जाने लगी।
एक दिन उसकी मेज पर मोटी फाइल रखी गई। उसने पन्ने खोले तो माथे पर बल पड़ गए। यह बुजुर्ग पेंशन स्कीम की फाइल थी, जिसमें करोड़ों रुपये का घोटाला छुपा था। तभी चपरासी रामलाल आया और बोला—
“सर, बड़े साहब ने आपको बुलाया है।”
अजय शर्मा सर के कमरे में पहुँचा।
“आओ अजय, बैठो। ये फाइल है, जल्दी से साइन कर दो। मैं छुट्टी पर जा रहा हूँ, वरना काम रुक जाएगा।”
अजय ने कहा—
“सर, मैं इसे पढ़कर ही साइन करूँगा।”
शर्मा सर झुंझलाए—
“अरे! इतना शक क्यों करते हो? मुझ पर भरोसा नहीं है क्या? मैं यहाँ तीस साल से काम कर रहा हूँ।”
उनकी आवाज़ सख्त होती जा रही थी। अजय दबाव में आ गया और बिना पढ़े साइन कर दिया।
उसे रातभर नींद नहीं आई। मन में बार-बार ख्याल आता—“कहीं मैंने कोई गलती तो नहीं कर दी?”
कुछ हफ्तों तक सब ठीक रहा। फिर एक सुबह अखबार की हेडलाइन देख उसने होश खो दिए—
“बुजुर्ग पेंशन स्कीम में करोड़ों का घोटाला, आरोपी अधिकारी गिरफ्तार।”
उसमें अजय का नाम भी शामिल था।
गौरी भागती हुई आई—
“अजय! तुम्हारा नाम भी इसमें है। लोग कह रहे हैं तुमने साइन किया है।”
अजय ने सिर पकड़ लिया। ऑफिस पहुँचा तो उसकी मेज पर सस्पेंशन लेटर रखा था।