अजय का जीवन हमेशा से सीधा-सादा रहा था। वह एक छोटे से गाँव से पढ़-लिखकर शहर आया था। पिता किसान थे, जिनकी मेहनत की कमाई से उसने स्नातक तक की पढ़ाई की थी। माँ अक्सर कहतीं—
“बेटा, ईमानदारी सबसे बड़ी पूंजी है। चाहे गरीब रहना, पर कभी झूठ और फरेब का सहारा मत लेना।”
शायद यही शिक्षा उसकी आत्मा में गहराई तक उतर गई थी।
शहर में नौकरी लगना आसान नहीं था, लेकिन अजय ने मेहनत करके सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी हासिल कर ली। पहले-पहल सबकुछ ठीक था। काम ईमानदारी से करता, फाइलें सही ढंग से चेक करता और गाँव वालों को भी यही सिखाता कि जो हक़ है, वही माँगना चाहिए। लेकिन यही ईमानदारी धीरे-धीरे उसके लिए बोझ बन गई।
ऑफिस का माहौल कुछ और ही था। वहाँ चमचों और चाटुकारों का बोलबाला था। बड़े अधिकारी जो कहते, बाकी कर्मचारी उसी में हाँ-में-हाँ मिलाते। पर अजय के लिए यह स्वीकार करना कठिन था। एक दिन उसके बॉस शर्मा सर ने उसे बुलाकर कहा—
“अजय, ये फाइल है… इसमें बस साइन कर दो। गाँव के लिए नई स्कीम है।”
अजय ने फाइल खोली, पन्ने पलटे, और चेहरा गंभीर हो गया। उसमें स्पष्ट लिखा था कि बुजुर्गों और विधवाओं की पेंशन राशि का बड़ा हिस्सा रोककर सिर्फ नाम मात्र की राशि बाँटी जाएगी।
अजय ने सिर हिलाते हुए कहा—
“सर, इस पर मैं साइन नहीं कर सकता। ये जनता के साथ धोखा है।”
शर्मा सर की भौंहें तन गईं।
“देखो अजय, ज्यादा इमानदारी दिखाओगे तो नौकरी खतरे में डाल लोगे। समझदारी इसी में है कि वही करो जो ऊपर से आदेश आया है।”
लेकिन अजय अपने निर्णय पर अडिग रहा।
उस दिन के बाद से ही उसके लिए मुश्किलें बढ़ने लगीं। सहकर्मी दूर-दूर रहने लगे। चपरासी तक फाइलें समय पर उसकी मेज पर नहीं लाता। उसके खिलाफ अफवाहें फैलने लगीं कि वह अहंकारी है, दूसरों से मेलजोल नहीं रखता। धीरे-धीरे उसे महसूस हुआ कि ऑफिस की हवा ही बदल गई है।