पति सुनील का स्वभाव कुछ अलग ही था। पढ़ा-लिखा था, पर मन कहीं टिकता ही नहीं। नौकरी करता तो भी गिनती के महीनों में झगड़ा कर छोड़ देता।

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गाँव के उस छोटे से घर में अनिता का मन अब बार-बार घुटता। घर की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। बाहर से देखने पर घर सामान्य-सा लगता, लेकिन भीतर की हालत किसी टूटी नाव जैसी थी, जो बस डूबने से रह गई थी। पड़ोसियों के लिए यह बस गपशप का मुद्दा था। पास-पड़ोस में जाना अब अनिता के लिए बोझ-सा हो चुका था। लोग चेहरे पर मुस्कान ओढ़े रखते, लेकिन भीतर-ही-भीतर ताने मारने से बाज़ नहीं आते। कोई हँसते-हँसते पूछ देता “बहू, आजकल तो घर बड़ा चुप-चुप है, सुनील बाबू नौकरी पर नहीं जा रहे क्या?” और कोई धीरे से कानों में फुसफुसा देता—“कहीं उधार न माँग बैठे।”

अनिता के लिए यह सब जहर पीने जैसा था। उसने अपने जीवन में कभी किसी से एक पैसे तक की मदद नहीं माँगी थी, लेकिन बातें तो उड़ती हवा से भी तेज़ फैलती हैं। लोग चाहे कितने भी दूर हों, तानों की आंधी हर बार उसके दरवाजे तक पहुँच ही जाती।

पति सुनील का स्वभाव कुछ अलग ही था। पढ़ा-लिखा था, पर मन कहीं टिकता ही नहीं। नौकरी करता तो भी गिनती के महीनों में झगड़ा कर छोड़ देता। उसे लगता, अगर काम करेंगे तो बड़ी तनख्वाह ही होनी चाहिए, वरना घर बैठना ही बेहतर है। उसे छोटी-सी तनख्वाह अपनी शान के खिलाफ लगती। शुरू-शुरू में अनिता ने समझाने की कोशिश की—“सुनील, कोई काम छोटा नहीं होता। अगर शुरुआत छोटे से भी करोगे तो धीरे-धीरे रास्ते खुद-ब-खुद खुल जाते हैं।” लेकिन सुनील के कानों में ये बातें जाती ही नहीं थीं। उसका जवाब हमेशा एक ही रहता “मुझे नौकर नहीं बनना, मुझे तो मालिक बनना है।”

लेकिन मालिक बनने का सपना बस ख्यालों में ही रह गया। हकीकत यह थी कि अब घर का पूरा बोझ बूढ़े पिताजी की पेंशन पर आ टिका था। वही पेंशन, जो किसी तरह दवाइयों और रसोई की जरूरतें पूरी कर रही थी। पिताजी की तबियत भी इन दिनों ढलने लगी थी। बाहर जाना लगभग बंद हो गया था। माँ पहले ही इस दुनिया से जा चुकी थीं। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी धीरे-धीरे अनिता के कंधों पर आने लगी थी।

कर्ज़ का बोझ दिन-ब-दिन भारी होता जा रहा था। कभी दूधवाला तकादा करने आता, कभी किराने वाला। दोनों हाथ जोड़कर कहता—“बहू जी, अब तो बहुत हो गया, कुछ तो दीजिए।” अनिता चुपचाप सिर झुका लेती, और पीछे से सुनील वही घिसा-पिटा जवाब देता—“दे देंगे, बस कुछ दिनों की बात है।” लेकिन वो “कुछ दिन” कभी पूरे ही न होते।

Ankit Verma

अंकित वर्मा एक रचनात्मक और जिज्ञासु कंटेंट क्रिएटर हैं। पिछले 3 वर्षों से वे डिजिटल मीडिया से जुड़े हैं और Tophub.in पर बतौर लेखक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। लाइफस्टाइल, टेक और एंटरटेनमेंट जैसे विषयों में विशेष रुचि रखते हैं।

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