मास्टरजी गाँव के सबसे सीधे, सबसे सच्चे और सबसे विद्वान इंसान माने जाते थे। पत्नी का साया तो सालों पहले ही उठ चुका था।

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अजय अपना बैग धीरे-धीरे समेट रहा था। आँगन में पसरे सन्नाटे को जैसे हर चीज़ महसूस कर रही थी पुरानी चारपाई, कोने में रखी कुर्सी, यहाँ तक कि दीवार पर टंगी घड़ी भी जैसे ठहर-सी गई थी। कल ही तो मास्टर रघुनाथ प्रसाद की तेरहवीं का काम सम्पन्न हुआ था। उस घर की रौनक, वह धीमी-धीमी ठहाकों वाली आवाज़… सब मानो हवा में घुलकर खो गई थी।

मास्टरजी गाँव के सबसे सीधे, सबसे सच्चे और सबसे विद्वान इंसान माने जाते थे। पत्नी का साया तो सालों पहले ही उठ चुका था। बेटा और बहू दोनों दिल्ली जाकर बस गए थे। शहर की चकाचौंध में उलझे हुए, उन्होंने गाँव और पिता की जिम्मेदारियों से जैसे दूरी बना ली थी। त्योहारों पर कभी-कभी आ भी जाते, लेकिन उनका मन यहाँ कहाँ लगता? जबकि मास्टरजी का मन तो इसी मिट्टी में, इसी आँगन में और इसी गाँव के लोगों में रमता था।

अजय के लिए यह घर सिर्फ एक मकान नहीं था, बल्कि उसकी पूरी जिंदगी का सहारा था। क्योंकि अजय मास्टरजी का खून का बेटा नहीं था। वह तो रामलाल का बेटा था—रामलाल, जो मास्टरजी के पुराने शिष्य और गरीब खेतिहर मजदूर थे। लेकिन किस्मत ने जैसे उनकी जिंदगी से सब छीन लिया था। बीमारी ने उन्हें बिस्तर से बाँध दिया। उस कठिन घड़ी में मास्टरजी ने रामलाल का हाथ पकड़कर कहा था—
“चिंता मत करो, तुम्हारा अजय अब मेरा बेटा है। मैं इसका ध्यान रखूँगा।”

वह कोई कहने भर की बात नहीं थी। मास्टरजी ने सचमुच उस जिम्मेदारी को निभाया। अजय को स्कूल में दाख़िला दिलाया, पढ़ाई का खर्च उठाया, कपड़े दिलवाए। कॉलेज तक की पढ़ाई भी उन्होंने अपने बूते करवाई। धीरे-धीरे अजय उनके साथ ही रहने लगा। मास्टरजी हमेशा कहते—
“बेटा, खून से ही रिश्ता नहीं होता। संस्कार और प्रेम से भी बेटा पैदा होता है।”

अजय ने भी यह रिश्ता दिल से निभाया। सुबह-शाम मास्टरजी की दवा से लेकर उनका खाना, उनकी संगत—सब कुछ वही करता। यही वजह थी कि गाँव भर में लोग कहते—“अजय तो मास्टरजी का असली बेटा है।”

लेकिन जिंदगी इतनी आसान कहाँ होती है। अजय की पत्नी, सुनीता, अकसर खीज जाती थी।
“दिन-रात उनकी सेवा करते रहते हो। हमारे लिए कब जियोगे? उनके बेटे-बहू तो शहर में ऐश कर रहे हैं, और यहाँ सारा बोझ हमारे ऊपर है!”
अजय हर बार बस मुस्कुराकर कह देता—
“जिस इंसान ने मुझे सिर उठाकर जीने लायक बनाया, उसके लिए दो वक्त देना गुनाह नहीं है। उनका हक मुझसे ज्यादा कौन अदा करेगा?”

Ankit Verma

अंकित वर्मा एक रचनात्मक और जिज्ञासु कंटेंट क्रिएटर हैं। पिछले 3 वर्षों से वे डिजिटल मीडिया से जुड़े हैं और Tophub.in पर बतौर लेखक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। लाइफस्टाइल, टेक और एंटरटेनमेंट जैसे विषयों में विशेष रुचि रखते हैं।

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