मगर अब मास्टरजी नहीं रहे थे। उनके जाने के बाद घर सूना हो गया था। आँगन की मिट्टी भी जैसे चीख रही थी। अजय सोच रहा था कि अब शायद उसे यहाँ से लौट जाना चाहिए।
इसी बीच, दिल्ली से आए मास्टरजी के बेटे और बहू ने आवाज़ दी—
“अजय, हम तो अब वापस जा रहे हैं। तुम भी सामान समेट लो।”
अजय चुप रहा। बैग की ज़िप बंद करते हुए धीरे से बोला—
“ठीक है, आप लोग जाइए। मैं शाम तक घर खाली कर दूँगा।”
उसकी आवाज़ में न ठंडापन था, न शिकायत, सिर्फ़ थकान थी।
यह सुनकर बहू की आँखें भर आईं। उसने अजय का हाथ पकड़ लिया और बोली—
“नहीं अजय, घर खाली मत करना। सच कहूँ तो मास्टरजी ने हमेशा तुम्हें ही अपना असली बेटा माना। हमने तो बस फोन पर हालचाल लिया, लेकिन तुमने उनका बुढ़ापा सँवारा। यह घर अब तुम्हारा है। यह मास्टरजी की आखिरी इच्छा थी।”
अजय जैसे पत्थर बन गया। उसकी आँखों से आँसू ढलक पड़े। यह सुनकर दरवाजे पर खड़ी सुनीता भी अंदर चली आई। बहू ने उसे पास बुलाकर कहा—
“बहन, अब यह घर तुम्हारा है। इसमें तुम्हारा हक सबसे पहले है। मास्टरजी का आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।”
वह पल किसी चमत्कार से कम नहीं था। जिस बहू ने जीवनभर अपने ससुर से दूरी बनाए रखी, आज वही मान रही थी कि अजय ही असली वारिस है।
अजय और सुनीता दोनों मास्टरजी की तस्वीर के सामने झुककर रो पड़े। तस्वीर के सामने रखा दिया हल्की-हल्की हवा से झिलमिला रहा था, मानो मास्टरजी खुद वहाँ खड़े होकर आशीर्वाद दे रहे हों।
लेकिन यहीं से कहानी का असली मोड़ शुरू होता है।
क्योंकि उसी रात अजय को मास्टरजी की पुरानी संदूकची में एक डायरी मिली। डायरी में पीली पड़ चुकी स्याही से लिखी चिट्ठियाँ थीं। हर पन्ने पर कोई अनकहा राज़ दबा था।
एक जगह लिखा था—
“अगर मेरा बेटा मुझे छोड़ भी दे, तो मुझे कोई दुख नहीं होगा। मेरा असली सहारा अजय है। उसे मेरी वसीयत और मेरी डायरी जरूर मिलनी चाहिए।”
वसीयत? अजय की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने काँपते हाथों से पन्ने पलटे।
अंदर लिखा था—
“मेरे नाम पर जो भी ज़मीन-जायदाद है, उसका असली हकदार अजय होगा। क्योंकि वह सिर्फ मेरा बेटा नहीं, बल्कि मेरी आत्मा का टुकड़ा है।”
अजय की आँखें चौड़ी हो गईं। क्या मास्टरजी ने सब कुछ उसी के नाम कर दिया था?
सुनीता ने जब यह पढ़ा तो उसकी आँखों में गर्व और सुकून दोनों आ गए। उसने पहली बार बिना खीजे कहा—
“अजय, देखो… तुम्हारा त्याग बेकार नहीं गया। सचमुच, भगवान भी वही रिश्ता मानता है जो दिल से निभाया जाए।”
अजय ने डायरी सीने से लगा ली। उसकी आँखों के सामने एक-एक कर मास्टरजी की यादें तैरने लगीं—पढ़ाते हुए, हँसते हुए, गुस्सा करते हुए, और सबसे ज्यादा प्यार से पुकारते हुए—“अजय बेटा…”
अब यह घर उसका था, पर सिर्फ मकान के रूप में नहीं। यह घर उसके पिता की आत्मा का घर था। और अब वह जानता था कि उसे इस घर, इस गाँव, इस मिट्टी से कभी अलग नहीं होना।
उस रात अजय नींद में भी रो रहा था। लेकिन आँसू अब दुख के नहीं थे, गर्व के थे।
सुबह सूरज की पहली किरण जब आँगन में पड़ी, तो दीवार पर टंगी मास्टरजी की तस्वीर चमक उठी। ऐसा लगा मानो वह कह रही हो—
“अजय, तुमने साबित कर दिया… खून से नहीं, सच्चे मन से निभाए रिश्ते ही असली परिवार बनाते हैं।”