सुबह-सुबह जब अजय ऑफिस में अपनी फाइलें टेबल पर रख ही रहा था, तभी फोन की घंटी बजी। उसने रिसीवर उठाया तो दूसरी तरफ से एक ठंडी लेकिन सख्त आवाज़ आई
“नमस्ते! मैं आपकी बेटी की क्लास टीचर रेखा मेम बोल रही हूँ। आज दूसरी क्लास की पैरेंट्स-टीचर मीटिंग है। कृपया अपनी बेटी के साथ समय पर पहुँचिएगा।”
अजय के माथे पर बल पड़ गए। ऑफिस में काम का बोझ पहले ही सिर पर था, लेकिन बेटी की बात आई तो उसने बिना सोचे छुट्टी ली और सीधा घर जाकर बेटी अन्वी को स्कूल ले गया।
क्लासरूम में गुलाबी साड़ी पहने, माथे पर छोटी-सी बिंदी लगाए, चेहरा तेज़ और आँखों में सख्ती भरी रेखा मेम बैठी थीं। अजय ने अभिवादन किया ही था कि उन्होंने कड़क स्वर में कहा
“रुकिए! पहले और पेरेंट्स से बात कर लूँ, फिर आपसे अलग से चर्चा करूंगी।”
अजय चुप हो गया। पीछे बैठते हुए उसने बेटी को देखा। अन्वी की आँखों में डर साफ झलक रहा था। उसने पापा के कान में फुसफुसाकर कहा—
“पापा, आज तो मुझे डांट पड़ने वाली है…”
अजय ने हल्की मुस्कान दी, “बेटा, लगता है तुम्हारी मैडम तुम्हें नहीं, मुझे पढ़ाने वाली हैं।”
कुछ देर बाद नाम पुकारा गया। अजय और अन्वी डरते-डरते रेखा मेम के पास पहुँचे। अन्वी पापा के पीछे छुप गई।
रेखा मेम ने रिपोर्ट कार्ड और कॉपियाँ मेज़ पर रखते हुए कहा—
“देखिए, आपकी बेटी की स्थिति बहुत खराब है। पहले अंग्रेज़ी देखिए, इसमें फेल।”
अजय ने बेटी को देखा, उसके चेहरे पर शर्म और डर दोनों थे। मगर अजय ने मुस्कुराकर कहा—
“मेम, अंग्रेज़ी तो विदेशी भाषा है। इस उम्र में जब बच्चा अपनी मातृभाषा भी पूरी तरह नहीं समझता, तो अंग्रेज़ी में पास होना कितना ज़रूरी है?”
रेखा मेम भड़क उठीं—
“तो आप हिंदी देखिए! इसमें भी फेल।”
अजय ने धीरे से कहा—