गाँव नरहरपुर में हर गली, हर चौपाल पर एक ही बात कही जाती थी—
“रात में पुराने कुएँ के पास मत जाना।”
गाँव की औरतें अपने बच्चों को डराने के लिए कहतीं—
“अगर शरारत की तो कुएँ वाली चुड़ैल पकड़ ले जाएगी।”
बच्चे डर जाते, लेकिन बड़े-बुज़ुर्गों की आँखों में भी एक अजीब-सी सच्चाई छिपी रहती। मानो वे उस कुएँ की असलियत जानते हों, लेकिन बोलते नहीं थे।
शंकर की दुनिया
गाँव के किनारे रहता था शंकर। एक सीधा-सादा किसान। उसकी ज़िंदगी खेत, बैल और छोटी-सी बेटी गौरी के इर्द-गिर्द घूमती थी।
शंकर की पत्नी की मौत बेटी के जन्म के वक़्त हो गई थी। तभी से गौरी उसके लिए सब कुछ थी।
गाँव वाले कहते—
“शंकर, तू एक ही बेटी के सहारे कितना दिन काटेगा? दूसरी शादी कर ले।”
लेकिन शंकर हमेशा एक ही जवाब देता—
“मेरी दुनिया गौरी है। जब तक मैं जिंदा हूँ, उसे माँ-बाप दोनों का प्यार दूँगा।”
पहली आहट
एक दिन, सांझ के वक़्त, गौरी अपने दोस्तों के साथ खेलते-खेलते कुएँ के पास पहुँच गई। बच्चों की हँसी-ठिठोली के बीच अचानक गौरी गायब हो गई।
बच्चे चिल्लाए—
“गौरी कुएँ में गिर गई!”
गाँव के लोग दौड़कर आए, लेकिन किसी ने नीचे झाँकने की हिम्मत नहीं की। सब बस डरते हुए बोले—
“ये वही शाप है… चुड़ैल उसे ले गई।”
शंकर पागलों की तरह दौड़ा। उसने कुएँ में झाँका तो गहराई में सिर्फ़ अंधेरा दिखा। लेकिन तभी एक आवाज़ आई—
“बचाओ… बचाओ…”
उसका दिल दहल गया। वो गौरी की आवाज़ नहीं थी, लेकिन किसी औरत की पुकार ज़रूर थी।