संध्या अपने कमरे में चुपचाप बैठी थी। सामने मैगज़ीन खुली थी लेकिन आँखें उसके पन्नों पर नहीं, कहीं दूर शून्य में टिकी हुई थीं। कई दिनों से उसका मन भारी था। ससुराल में रहते हुए उसने बहुत कुछ सहा था, लेकिन आज की घटना ने उसकी चुप्पी तोड़ दी थी। तभी बाहर से पति वरुण की जोरदार आवाज़ आई
“संध्या! बाहर आओ अभी!”
उसने गहरी सांस ली, पर जवाब नहीं दिया। आवाज़ में गुस्से का तूफ़ान साफ़ झलक रहा था। और वह जानती थी, अगर अभी बाहर गई तो वही बवाल और बढ़ जाएगा। लेकिन वरुण की आवाज़ और तेज़ हो गई
“बहुत आसमान में उड़ने लगी हो तुम। अभी के अभी बाहर निकलो, वरना खींच कर ले जाऊँगा।”
संध्या चुप रही। दरवाज़ा धड़धड़ाते हुए खुला और वरुण कमरे में आ गया। उसकी आँखों में गुस्सा था और चेहरे पर अपमान का भाव। उसने झपटकर संध्या की बाँह पकड़ी और खींचते हुए बाहर हाल में ले आया। सोफे पर धकेलते हुए बोला—
“बहू हो तो बहू बनकर रहो। घर की मालकिन बनने का सपना छोड़ दो। कब से आवाज़ दे रहा हूँ, सुनाई नहीं देता क्या? और तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी माँ और बहन से इस तरह की बात करने की!”
संध्या ने खुद को संभाला। सामने देखा तो सास गीता जी और ननद प्रेरणा, दोनों खड़ी होकर कुटिल मुस्कान के साथ तमाशा देख रही थीं। जैसे उनकी जीत का ऐलान हो गया हो।
संध्या ने धीमी आवाज़ में कहा,
“क्या बात है वरुण, क्यों चिल्ला रहे हो?”
उसकी शांत आवाज़ से वरुण और भड़क गया।
“कैसी बेशर्म औरत हो तुम! घर में इतना हंगामा हो गया और तुम पूछ भी रही हो कि क्या हुआ? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी माँ और बहन की बेइज्ज़ती करने की! सबके सामने! अभी के अभी माफी माँगो। वरना इस घर से बाहर निकाल दूँगा।”