“भैया, अगले हफ़्ते गृहप्रवेश है… रविवार को। आप सबको आना ही पड़ेगा। गाड़ी मैं भेज दूँगा।”
फोन पर छोटे भाई आदित्य की उत्साहित आवाज़ गूंज रही थी।
मोहन ने सहजता से पूछा—
“किसी नए किराए के घर में शिफ्ट हो रहे हो क्या?”
उधर से आदित्य की धीमी, पर गर्व भरी आवाज़ आई—
“नहीं भैया… यह घर हमारा अपना है। किराए का नहीं।”
मोहन कुछ पल चुप रह गया। जैसे कानों पर विश्वास न हुआ हो। उसके मुँह से बस इतना निकला—
“अपना घर…?”
“हाँ भैया।”— इतना कहकर आदित्य ने कॉल काट दिया।
मोहन के दिल-दिमाग़ में बार-बार वही शब्द गूंजने लगे—
“अपना घर… अपना घर…”
बीते सालों की परछाइयाँ
मोहन और आदित्य में बारह साल का उम्र का फासला था। जब आदित्य सिर्फ़ सात साल का था, तभी माता-पिता की बीमारी से अचानक मौत हो गई। घर की सारी ज़िम्मेदारी उस वक़्त बीस बरस के मोहन पर आ गिरी।
मोहन ने नौकरी की और जल्दबाज़ी में शादी भी कर ली, ताकि कोई घर में छोटे आदित्य का ख़्याल रख सके।
सरकारी दफ़्तर की मामूली नौकरी में तनख्वाह का ज़्यादातर हिस्सा किराए और आदित्य की पढ़ाई में चला जाता।
मोहन की पत्नी अक्सर मुस्कुराकर कह देती—
“हमारे बच्चे थोड़ी देर इंतज़ार कर लेंगे… पहले छोटे को बड़ा कर लो।”
सचमुच, दोनों ने अपनी खुशियों को पीछे रख दिया। महंगे कपड़े, घूमना-फिरना, अपने बच्चों के अरमान—सब पर पर्दा डाल दिया। बस एक ही सपना था—आदित्य पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा हो जाए।
आदित्य की उड़ान
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। आदित्य पढ़ाई पूरी करके एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा गया। शादी भी हो गई। जगह की कमी के कारण अलग किराए पर रहने लगा।
उधर मोहन के भी दो बच्चे हुए—बेटी बड़ी थी और बेटा छोटा।
मोहन ने जैसे-तैसे जीवन को संभाले रखा। उसके मन में हमेशा यही संतोष था कि उसने छोटे भाई को पाल-पोसकर काबिल बनाया।
लेकिन जब आदित्य ने अचानक बताया कि उसने अपना मकान खरीद लिया है, तो मोहन के दिल में एक कसक उठी।
उसने अपनी पत्नी से कहा—
“सोचो, हमने अपने बच्चों को कभी महंगे कपड़े तक नहीं दिलाए। अपनी थाली से सब्ज़ी निकालकर छोटे को खिलाया। और आज उसने हमें बताया तक नहीं… कि उसने अपना घर बना लिया। दुख मकान का नहीं है, इस दूरी का है।”
मोहन की पत्नी की आँखें भी भर आईं। लेकिन दोनों चुपचाप एक-दूसरे को ढाढ़स देते रहे।