मोहन ने नौकरी की और जल्दबाज़ी में शादी भी कर ली, ताकि कोई घर में छोटे आदित्य का ख़्याल रख सके।

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गृहप्रवेश का दिन

रविवार को आदित्य की भेजी गाड़ी मोहन और उसके परिवार को नए घर के सामने उतार गई।

मोहन जैसे पत्थर का हो गया—
विशाल मकान, सुंदर रंग, हर सुविधा से लैस। और सबसे बड़ी बात—घर बिल्कुल दो हिस्सों में बँटा हुआ था।

मोहन के दिल में कसक उठी—
“छोटे ने अपने बच्चों के लिए पहले से सोच लिया। और मैं? बेटी की शादी के लिए भी ढंग से पैसे नहीं जोड़ पाया।”

उसकी आँखें छलक आईं, मगर उसने चुपके से आँसू पोंछ लिए ताकि कोई देख न सके।

असली तोहफ़ा

उसी वक़्त पुजारी ने आवाज़ लगाई—
“गृहप्रवेश का शुभ मुहूर्त हो रहा है। घर के मालिक यज्ञकुंड के पास आकर बैठें।”

आसपास खड़े दोस्तों ने आदित्य को आगे बढ़ाया। लेकिन आदित्य मुस्कुराया और बोला—
“पंडित जी, इस घर का मालिक मैं अकेला नहीं हूँ। मेरे बड़े भाई मोहन भी हैं। आज मैं जहाँ खड़ा हूँ, यह सब उनकी मेहनत और त्याग का नतीजा है। यह घर दो हिस्सों में बँटा है—एक उनका, एक मेरा।”

इतना कहकर आदित्य ने मोहन का हाथ पकड़ा और यज्ञकुंड के पास बिठा दिया।

मोहन की आँखों में आँसू छलक आए। उसके गले से आवाज़ तक नहीं निकल पा रही थी।

भाईचारे का वादा

यज्ञकुंड के मंत्र गूंज रहे थे। आदित्य ने धीरे से मोहन के कान में कहा—
“भैया, अपनी बेटी की शादी की चिंता छोड़ दीजिए। वह हमारी दोनों की ज़िम्मेदारी है। जैसे आपने मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया, वैसे ही अब मैं आपके बच्चों के साथ खड़ा हूँ।”

मोहन की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। लेकिन वे आँसू दुख के नहीं, गर्व और कृतज्ञता के थे।

उसका दिल बार-बार यही कह रहा था—
“भाई तो बहुत मिलते हैं इस दुनिया में… पर आदित्य जैसा छोटा भाई बिरले ही होता है। जो सिर्फ़ भाई नहीं, बल्कि जीवन भर का सहारा बनता है।”

Ankit Verma

अंकित वर्मा एक रचनात्मक और जिज्ञासु कंटेंट क्रिएटर हैं। पिछले 3 वर्षों से वे डिजिटल मीडिया से जुड़े हैं और Tophub.in पर बतौर लेखक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। लाइफस्टाइल, टेक और एंटरटेनमेंट जैसे विषयों में विशेष रुचि रखते हैं।

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