रात के करीब आठ बज रहे थे।
पूरे घर में सन्नाटा था, बस किचन से बर्तनों की हल्की खटपट सुनाई दे रही थी।
नंदिनी अपने कमरे में चुपचाप बैठी हुई किताब पलट रही थी।
तभी बाहर से उसके पति आकाश की आवाज़ आई।
“नंदिनी… ज़रा बाहर आओ, बात करनी है।”
नंदिनी ने पहले तो सुना ही नहीं।
जैसे उसने आवाज़ को अनसुना कर दिया हो।
कुछ देर इंतज़ार करने के बाद आकाश गुस्से में कमरे तक आ गया और दरवाज़े के पास खड़ा होकर बोला,
“बहुत ज्यादा घमंड चढ़ गया है तुम्हें। अभी के अभी बाहर आओ, नहीं तो खींचकर ले जाऊँगा।”
नंदिनी फिर भी शांत रही।
उसकी चुप्पी ने आकाश के गुस्से को और भड़का दिया।
उसने कमरे का दरवाज़ा खोला और नंदिनी का हाथ पकड़कर उसे हॉल में खींच लाया।
सोफ़े पर धकेलते हुए ऊँची आवाज़ में बोला,
“बहू हो तो बहू बनकर रहो, घर की मालकिन बनने की ज़रूरत नहीं है। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी माँ और बहन से उल्टा जवाब देने की।”