लेकिन जिंदगी इतनी आसान कहाँ होती है। एक दिन अचानक मेरी पत्नी बिना बताए बच्चों को मायके छोड़कर मेरे पास आ गई। दरवाजे पर उसका मुस्कुराता चेहरा देखकर मेरे सारे ख्वाब बिखर गए। अगले तीन दिन मैं लगातार डरता रहा कि कहीं पत्नी की मुलाकात उस महिला से न हो जाए। मैं पत्नी को टालता रहा, बाहर घूमने जाने से कतराता रहा। मन में बस एक ही डर था अगर दोनों आमने-सामने आ गईं तो मैं क्या जवाब दूँगा?
पत्नी लौट गई, लेकिन दिल का डर वहीं रह गया।
कुछ दिनों तक वह महिला बैंक में नज़र नहीं आई। मैं बेचैन हो गया। पार्क में उसे ढूँढ़ता, बस स्टॉप पर खड़ा रहता, यहाँ तक कि उसके पते तक जाने की सोच ली… मगर हिम्मत नहीं जुटा पाया।
और फिर एक शाम दरवाजे की घंटी बजी। दरवाज़ा खोला तो सामने वही थी—हाथ में सफेद रजनीगंधा का बुके लिए खड़ी।
“कल बैंक गई थी, सुना आप छुट्टी पर हैं। सोचा, मिल लूँ,” उसने सहजता से कहा।
मेरे लिए यह किसी सपने जैसा था। मगर अगले ही पल उसका अगला वाक्य मेरे सारे सपनों को तोड़ गया—
“मेजर साहब का ट्रांसफर इसी शहर में हो गया है। अब हम सब यहीं रहेंगे।”
उसके चेहरे पर खुशी थी, और मेरे दिल में सिर्फ़ खालीपन।
उसके जाते ही मैं सोफे पर ढह गया। दिमाग में बस एक ही सवाल घूम रहा था—क्या यह सब मेरी ही गलतफहमी थी? उसने तो कभी कोई सीमा पार नहीं की थी, न कोई वादा, न कोई इशारा। सारी अनैतिकता, सारे ख्वाब तो सिर्फ़ मेरे मन ने गढ़े थे।
उस रात मैं करवटें बदलता रहा। सुबह पहली बस पकड़कर अपने परिवार के पास लौट आया। अब मुझे समझ आया कि सच्चा सुकून उन्हीं रिश्तों में है जिन्हें हम पहले से निभा रहे हैं। बाकी सब बस एक मृगमरीचिका थी, जो पास आती दिखती है, मगर असल में हमेशा दूर ही रहती है। Romantic Story