दिन बीतते गए। बैंक में मेरी नई-नई नौकरी थी और मैं काम में डूबा रहता। एक दिन कैबिन का दरवाज़ा खुला और वही महिला अंदर आई। इस बार वह साधारण नहीं, बल्कि बेहद शालीन लगी—बाल पीछे समेटे, माथे पर चश्मा टिकाए, चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास। उसने कहा –
“मुझे लॉकर चाहिए।”
मैंने उसे बैठने का इशारा किया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैं अपने मन को समझा रहा था कि यह सिर्फ़ एक ग्राहक है, मगर आँखें बार-बार उसकी ओर खिंच जाती थीं। उसने बताया कि वह स्कूल में अध्यापिका है, कई सालों से लॉकर के लिए आवेदन कर रही है, पर कहीं सुनवाई नहीं हुई।
उसकी बातों में सरलता और चेहरें पर आत्मविश्वास ने मुझे तुरंत प्रभावित कर दिया। मैंने बिना देर किए उसके कागज़ लिए और अगले ही दिन लॉकर उपलब्ध कराने का वादा किया।
अब हमारी मुलाकातें बढ़ने लगीं। कभी बैंक में, कभी पार्क में, तो कभी अचानक सड़क पर। रविवार की सुबहें खास हो गई थीं मैं दौड़ने जाता तो वह भी वहीं होती। पहले दो चक्कर चुपचाप, फिर तीसरे चक्कर में बातें शुरू हो जातीं। उसके हँसने का अंदाज़, बच्चों के बारे में बातें करना, और मेरे ऑफिस के किस्सों पर उसकी दिलचस्पी—सब कुछ एक अजीब-सी लत की तरह हो गया।
मैं जानता था कि वह शादीशुदा है, उसके दो छोटे बेटे हैं और पति आर्मी में मेजर हैं। मगर यह जानने के बावजूद मेरा मन हर बार उससे मिलने को बेचैन हो उठता।
धीरे-धीरे मैं उसके व्यक्तित्व के हर पहलू को महसूस करने लगा। बिना मेकअप के भी उसके चेहरे की कशिश दिल को छू लेती थी। एक दिन उसने अपनी उम्र बताई—38 साल। मैं दंग रह गया। मैंने मजाक में कहा –
“आप तो बिल्कुल 25 की लगती हैं।”
उसके चेहरे पर आई लाली मेरे लिए किसी ईनाम से कम नहीं थी। वह हल्की-सी मुस्कान और आँखों की चमक… मैं उसी पल हार गया।