इसी भीड़ के बीच मेरी नज़र अचानक बच्चों के कोने पर पड़ी। वहां रंग-बिरंगे चित्रों वाली किताबें सजी थीं।

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उसकी यह बात सुनकर मेरे अंदर जैसे कुछ टूट गया। मैंने कांपते हुए पूछा—
“लेकिन तुम्हारी मम्मी तो तुम्हारे साथ हैं ना?”

उसकी आवाज़ फटी, पर मुस्कान बनी रही—
“नहीं अंकल… डॉक्टर अंकल कहते हैं कि मम्मी अब ज़्यादा दिन हमारे साथ नहीं रहेंगी। पापा कहते हैं कि वो बहन के पास जाने वाली हैं। मैंने पापा से कहा कि मम्मी थोड़ी देर रुक जाएँ, जब तक मैं यह किताब खरीदकर उन्हें ना दे दूँ।”

यह सुनते ही मेरा दिल थम गया। इतनी छोटी बच्ची अपने घर की सबसे बड़ी सच्चाई इतनी मासूमियत से बता रही थी।

फिर उसने अपनी जेब से एक पुराना, मुड़ा-तुड़ा फोटो निकाला। उसमें वही बच्ची खिलखिलाकर हंस रही थी। उसने कहा—
“यह मेरी तस्वीर है। मैं चाहती हूँ कि मम्मी इसे भी अपने साथ ले जाएँ। ताकि मेरी बहन मुझे भूल न पाए।”

मेरी आँखों से आँसू बह निकले। मैं चुपचाप अपने बटुए से कुछ पैसे और मिलाकर गिनने लगा। इस बार पैसे पूरे थे। मैंने दुकानदार से कहा—
“अब तो किताब ले सकती है ना?”

बच्ची खुशी से उछल पड़ी। उसने आसमान की ओर देखा और कहा—
“वाह! भगवान ने मेरी दुआ सुन ली। मैंने कल रात उनसे प्रार्थना की थी कि मुझे इतने पैसे मिल जाएँ कि मैं किताब खरीद सकूँ। अब तो मैं एक सफेद फूल भी ले सकती हूँ। मम्मी को सफेद फूल बहुत पसंद हैं।”

मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा, पर मेरी आँखें नम थीं।

उसके बाद मैं दुकान से निकल आया। पर उसके शब्द, उसकी मासूमियत मेरे दिल में गूंजती रही।

कुछ दिनों पहले ही मैंने अख़बार में एक खबर पढ़ी थी। उसमें लिखा था—
“एक नशे में धुत ट्रक चालक ने मोबाइल पर बात करते हुए तेज़ रफ्तार में एक गाड़ी को टक्कर मार दी। गाड़ी में बैठी छोटी बच्ची की मौके पर ही मौत हो गई और उसकी माँ गहरी कोमा में चली गई।”

उस खबर को पढ़ते समय मुझे झटका लगा था, लेकिन उस वक्त नहीं जानता था कि ये वही परिवार हो सकता है। अब मेरे दिल में डर था—क्या ये वही बच्ची और उसकी माँ हैं?

दो दिन बाद अख़बार ने फिर खबर छापी—
“कोमा में पड़ी महिला की भी मौत हो गई।”

उस खबर ने मेरे पैरों तले ज़मीन खींच ली। मैं खुद को रोक नहीं पाया और अंतिम दर्शन के लिए चला गया।

शव-दाह गृह में सफेद चादरों के बीच वही महिला लेटी थी। उसका चेहरा सफेद कपड़े से ढंका था। उसके हाथ में एक सफेद फूल रखा था। और उसके सीने पर वही किताब रखी थी—जिस पर रंग-बिरंगे फूल बने थे। किताब पर एक तस्वीर चिपकी थी। वही तस्वीर—जिसमें नन्ही बच्ची खिलखिलाकर हंस रही थी।

मैं फूट-फूटकर रो पड़ा। मेरे सामने ज़िंदा सबूत था कि एक छोटी बच्ची का प्यार, उसका समर्पण और उसकी दुआ कितनी गहरी हो सकती है। उसने अपनी पूरी मासूमियत से माँ और बहन के लिए एक संसार बसाया था। लेकिन एक लापरवाह चालक, जिसने शराब पी और फोन पर ध्यान रखा, उसने उस बच्ची की पूरी दुनिया छीन ली।

Ankit Verma

अंकित वर्मा एक रचनात्मक और जिज्ञासु कंटेंट क्रिएटर हैं। पिछले 3 वर्षों से वे डिजिटल मीडिया से जुड़े हैं और Tophub.in पर बतौर लेखक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। लाइफस्टाइल, टेक और एंटरटेनमेंट जैसे विषयों में विशेष रुचि रखते हैं।

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