कमरे का माहौल एकदम भारी हो गया। चुप्पी छा गई।
अरुण ने अपनी पत्नी की तरफ़ देखा, फिर पिताजी की ओर। वो कुछ क्षण स्थिर खड़ा रहा, मानो शब्द तलाश रहा हो। फिर धीरे-धीरे पिताजी के पास आया और उनके काँपते हाथ पकड़कर बोला—
“रीमा, अगर तुम्हें जाना है तो तुम जा सकती हो। लेकिन मैं उस इंसान का हाथ कभी नहीं छोड़ूँगा जिसने मेरे बचपन में मेरा हर बोझ बिना शिकायत उठाया।”
उसकी आँखों में आँसू तैरने लगे।
वो पिताजी की आँखों में झाँकते हुए बोला—
“बाबा, याद है? जब मैं छोटा था, डर के मारे या बीमारी की वजह से बिस्तर गीला कर देता था। तब आपने कभी मुझे डाँटा नहीं। आपने एक बार भी गुस्सा नहीं किया। बल्कि प्यार से समझाया, मेरे कपड़े धोए, मेरी यूनिफ़ॉर्म हमेशा साफ रखी। अगर आप उस समय मुझे बोझ समझते, तो आज मैं ये अरुण कभी नहीं बन पाता।”
गोविंद बाबू का गला भर आया। उन्हें लगा जैसे उनके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा का उत्तर मिल गया हो।
अरुण ने तुरंत जाकर नई चादर निकाली, बिस्तर बदला और पिताजी को आराम से बैठाया। फिर उनकी भीगी हुई धोती बदली और रसोई में जाकर अपने हाथों से हल्की अदरक वाली चाय बनाई।
“लीजिए बाबा, ये चाय पी लीजिए। आज रात आप मेरे कमरे में सोइए। मैं खुद आपकी देखभाल करूँगा।”
गोविंद बाबू की आँखों से आँसू बह निकले। काँपते हाथ बेटे के सिर पर आशीर्वाद देने लगे। उन्होंने कमरे की दीवार पर लगी पत्नी की तस्वीर की ओर देखा और धीमे स्वर में कहा—
“देखो सुनीता… तुम कहा करती थीं तुम्हारे बाद मेरा सहारा कौन बनेगा। ये देखो, हमारा अरुण वही सब कर रहा है जो तुम करती थीं।”
यह सुनकर दरवाज़े पर खड़ी रीमा का दिल काँप उठा। उसकी आँखों में शर्म और पछतावे के आँसू उमड़ आए। उसने आगे बढ़कर ससुर जी के पैरों में सिर रख दिया।
“पिताजी… माफ कर दीजिए। मैंने आपको बोझ समझा, ये मेरी सबसे बड़ी गलती थी। आज से मैं आपकी बेटी बनकर आपकी सेवा करूँगी।”
उसकी आवाज़ कांप रही थी। गोविंद बाबू ने उसे सिर से उठाया और गले लगा लिया।
घर का वातावरण जो कुछ देर पहले तनाव और नाराज़गी से भरा था, अब आँसुओं और रिश्तों की सच्ची गर्माहट से पिघल गया।
अरुण ने अपनी पत्नी की ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा—
“रीमा, रिश्ते खून से नहीं, निभाने से बनते हैं। जब हम अपने बच्चों की गलतियाँ बिना थके संभाल सकते हैं, तो क्या हमारे माता-पिता बूढ़े होकर हम पर भरोसा नहीं कर सकते?”
रीमा ने सिर झुका लिया। उसके चेहरे पर पश्चाताप था, लेकिन दिल में एक नया संकल्प भी।
उस रात पहली बार, गोविंद बाबू निश्चिंत होकर बेटे और बहू के बीच सोए। उनके दिल पर छाई हुई अकेलेपन की धुंध छँट चुकी थी। अब वे जान चुके थे कि उनका बुढ़ापा अकेलेपन का नहीं, बल्कि प्यार और सम्मान का होगा।
कमरे की खिड़की से आती चाँदनी जैसे इस रिश्ते की गवाही दे रही थी।
और उस रात, आँसू लाचारी के नहीं, बल्कि गर्व और सुख के थे।