अरुणाचल प्रदेश की खूबसूरत घाटियों में कई जनजातियां रहती हैं, जिनकी परंपराएं और जीवनशैली बेहद अनोखी हैं। इन्हीं में से एक है अपातानी जनजाति, जो खासकर अपनी महिलाओं से जुड़ी अनोखी परंपराओं के लिए जानी जाती रही है। कभी इस जनजाति की महिलाएं चेहरे पर बने गहरे टैटू और नाक में लगाए जाने वाले बड़े लकड़ी के प्लग्स की वजह से पहचानी जाती थीं। लेकिन इसके पीछे सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक वजहें थीं।
महिलाओं को अगवा कर ले जाती थीं दूसरी जनजातियां
पुरानी कहानियों के मुताबिक, अपातानी महिलाएं बेहद सुंदर मानी जाती थीं। उनकी सुंदरता इतनी मशहूर थी कि आसपास की दूसरी जनजातियां उन्हें अक्सर अगवा कर ले जाती थीं। इस खतरे से बचाने के लिए परिवारों ने बेटियों के चेहरे पर गहरे नीले टैटू बनवाने शुरू कर दिए। माना जाता था कि टैटू उनकी खूबसूरती कम कर देंगे और वे सुरक्षित रहेंगी।
आत्माओं से बचने की लोककथा
इस परंपरा को लेकर एक और लोककथा भी कही जाती है। मान्यता है कि जब जनजाति के पुरुष युद्ध में मारे जाते तो उनकी आत्माएं घर लौटकर अपनी पत्नियों को परेशान करती थीं। पुजारियों का कहना था कि अगर महिलाएं चेहरे पर टैटू बनवा लेंगी तो आत्माएं उन्हें पहचान नहीं पाएंगी। धीरे-धीरे यह परंपरा गहराई से समाज का हिस्सा बन गई।
टैटू और नोज प्लग का अनुष्ठान
लड़कियों का टैटू बनाने का अनुष्ठान लगभग 10 साल की उम्र में, पहले मासिक धर्म के समय किया जाता था। माथे से लेकर नाक तक एक मोटी सीधी रेखा और ठोड़ी पर पांच सीधी लकीरें गुदवाई जाती थीं। इसके लिए नुकीली कांटेदार सुइयों का इस्तेमाल होता और स्याही सूअर की चर्बी व कालिख मिलाकर तैयार की जाती थी। वहीं नाक में लगाए जाने वाले बड़े गोल लकड़ी के प्लग, जिन्हें “यापिंग हुरलो” कहा जाता था, जंगल की खास लकड़ी से बनाए जाते थे।
बिना टैटू और नोज प्लग के नहीं होती थी शादी
समय के साथ यह परंपरा सिर्फ सुरक्षा का उपाय नहीं रही। चेहरे पर बने टैटू और नोज प्लग महिलाओं की पहचान, सुंदरता और गर्व का प्रतीक बन गए। इतना ही नहीं, अगर किसी महिला के चेहरे पर टैटू और नोज प्लग न हों तो उसे विवाह योग्य नहीं माना जाता था। यानी शादी के लिए यह अनिवार्य हो गया था।
सरकार ने लगाई रोक
लेकिन धीरे-धीरे बदलते समय और आधुनिकता ने युवाओं की सोच को प्रभावित किया। उन्हें लगा कि यह परंपरा उन्हें बाहरी दुनिया से अलग करती है। 1970 के दशक में अपातानी यूथ एसोसिएशन और सरकार के प्रयासों से इस परंपरा पर रोक लगा दी गई। धीरे-धीरे यह प्रथा खत्म हो गई और आज यह केवल इतिहास का हिस्सा बनकर रह गई है।