रसोई में तवा तप रहा था। गर्म हवा की लहरें जैसे कमरे के कोनों तक जा रही थीं। आटे की लोई बेलन के नीचे गोल-गोल घूम रही थी, और रोटी धीरे-धीरे अपना आकार ले रही थी। लड़के के माथे पर पसीने की हल्की बूंदें चमक रही थीं, लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
पीछे से लड़की की धीमी आवाज़ आयी—
“सुनो… तुमसे एक बात कहनी थी।”
लड़का रोटी पलटते हुए मुस्कुराया।
“बोलो न… जैसे हर रोज़ ‘गुड नाइट’ या ‘गुड मॉर्निंग’ कह देती हो।”
लड़की की नज़रें झुक गईं। उंगलियाँ कांपने लगीं।
“काश ये उतना आसान होता… पर ये बात गले से उतर ही नहीं रही।”
लड़का तवे से उठते धुएँ के बीच भी सहज था। उसने धीमे स्वर में कहा—
“मेरे लिए तुम्हारी कही हर बात उतनी ही आसान है, जितनी सांस लेना। कह डालो।”
लड़की ने काँपते होठों से हिम्मत जुटाई।
“अब मैं तुमसे… प्यार नहीं करती।”
कमरे में अचानक सन्नाटा फैल गया। घड़ी की टिक-टिक तक साफ सुनाई देने लगी।
लड़के ने एक पल के लिए नज़रें ऊपर उठाईं, फिर चुपचाप रोटी पर घी लगाया और प्लेट में रख दी। उसकी आँखों में न आँसू थे, न गुस्सा। बस शांति थी।
“ठीक है…” उसने धीरे से कहा, “इसमें परेशान होने जैसा क्या है? ये भी ज़िंदगी का हिस्सा है।”
लड़की की आँखें भर आईं।
“असल में… मुझे किसी और से प्यार हो गया है। तुम्हें धोखा देने का बोझ मुझे चैन नहीं लेने दे रहा।”
लड़का उसके पास आया। उसके काँपते चेहरे को दोनों हथेलियों में थामा और शांत स्वर में बोला—
“धोखा तब होता जब तुम मेरे साथ रहते हुए किसी और का नाम छिपाती। सच बोलकर तुमने मुझे सम्मान दिया है। अगर दिल अब कहीं और है, तो वहीं जाओ। क्योंकि खुद से झूठ जीना… सबसे बड़ा धोखा है।”
लड़की फूट पड़ी। आँसुओं से भरे गाल उसके कंधे पर भीग गए। लड़के ने उसे कसकर गले लगाया। फिर दरवाज़े तक छोड़ आया। जाते-जाते बस हाथ हिलाकर कहा—
“ख़ुश रहना।”
सालों बाद…
बरसों बीत गए।
समय ने चेहरे पर झुर्रियाँ छोड़ दीं और बालों में सफेदी घुला दी।
लेकिन दिल के किसी कोने में वह रसोई, वह तपता तवा और वह आख़िरी आलिंगन अब भी ताज़ा था।
लड़की ने जीवन में कई रिश्ते निभाए। नए चेहरे, नए वादे, नए इश्क़… मगर हर विदाई में झगड़े, टूटन और शिकायतें ही हाथ लगीं। कोई भी उतनी सहजता से बिछड़ना नहीं जान पाया जितना उस लड़के ने।
कभी वह खुद सोचती—
“किसी का प्यार खत्म हो जाना तो सहा जा सकता है… लेकिन अहंकार पर लगी चोट? वह किसी को बर्दाश्त नहीं होती।”
लेकिन वह लड़का अलग था। उसने चोट नहीं दी थी। बस इज़्ज़त देकर, मुस्कुराकर उसे विदा किया था।
और फिर…
जीवन के ढलते वक्त में, जब कदम भारी हो चुके थे और दिल खाली, तब एक दिन अनजाने ही उसके कदम उसी पुराने दरवाज़े तक पहुँच गए।
डोरबेल दबाई।
भीतर से एक धीमी, बूढ़ी आवाज़ आयी—
“कौन?”
उसका गला कांप गया।
“मैं हूँ…”
भीतर से वही शांत आवाज़ गूंजी—
“दरवाज़ा खुला है, अंदर आ जाओ।”
वह काँपते कदमों से अंदर बढ़ी। रसोई तक पहुँची तो वही नज़ारा सामने था।
लड़का… अब बूढ़ा हो चुका। चश्मा लगाए, दूध उबलने से बचाते हुए चाय बना रहा था।
बिना देखे ही मुस्कुराकर बोला—
“आज भी तुम्हें एक ही चम्मच शक्कर चाहिए न?”
लड़की सिसक पड़ी। आँसू बह निकले।
“आज मैं तुमसे उतना ही… बल्कि उससे भी ज़्यादा प्यार करती हूँ। खुद को रोक नहीं पाई… तुम्हें देखने चली आयी।”
लड़का उसकी ओर मुड़ा। उसकी आँखों में वर्षों की तन्हाई, लेकिन उतनी ही गहराई भी थी। उसने कुछ नहीं कहा। बस उसे अपने सीने से लगा लिया।
माथे पर हल्की चुम्मी रखी और बोला—
“पगली… इतनी सी बात कहने में रोने की क्या ज़रूरत थी? अगर दिल अब भी मेरा है, तो यही काफी है। रहो यहीं, जब तक दिल चाहे।”
लड़की रोते-रोते बोली—
“अब कहीं नहीं जाऊँगी।”
लड़के ने उसके आँसू पोंछे। हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“प्यार को बंधन मत बनाओ। दुआ करो, इस बार मेरा प्यार इतना गहरा हो… कि तुम्हें मुझे छोड़ने का मन ही न करे।”
लड़की ने कुछ नहीं कहा। बस उसे और कसकर पकड़ लिया।
दोनों की आँखों से आँसू बह निकले—एक-दूसरे की प्यास बुझाते हुए, जैसे दो नदियाँ मिलकर एक ही सागर बन गई हों।
उनके गालों पर बहते आँसू और होंठों की हल्की मुस्कान… एकदम वैसे ही थे जैसे फिफ्टी-फिफ्टी बिस्किट—मीठे भी, नमकीन भी।
बिल्कुल ज़िंदगी की तरह।