सच का सामना
दरवाज़ा खुला। अर्जुन का चेहरा पीला पड़ा हुआ, आँखें लाल, और होंठ सूखे।
वो सीधे मीरा के सामने खड़ा होकर बोला—
“ये क्या है? इतने पैसे क्यों ट्रांसफर किए? और… अलमारी में क्या रखा है?”
मीरा ने बिना कुछ बोले बेडरूम की तरफ इशारा किया।
अर्जुन के कदम भारी थे, जैसे हर कदम उसे गहरे अंधेरे की तरफ ले जा रहा हो।
उसने अलमारी खोली।
अलमारी का सच
अंदर दस्तावेज़ थे—जॉइंट अकाउंट की पासबुक, प्रॉपर्टी के कागज़, और सबसे ऊपर एक सील किया हुआ लिफाफा।
उसके हाथ काँप रहे थे।
उसने लिफाफा खोला।
मीरा का पत्र
*”अर्जुन,
जब मैंने तुमसे शादी की थी, सोचा था कि ये रिश्ता दो आत्माओं का होगा। लेकिन शायद मैं तुम्हारी जिंदगी में सिर्फ एक नाम भर रह गई।
तुम्हारे हर झूठ का मुझे पता था—’ट्रिप्स’, ‘मीटिंग्स’, ‘फ्लाइट्स’। मैं चुप रही क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती थी।
लेकिन आज तुम्हारी हँसी किसी और के साथ देखकर समझ गई हूँ कि मेरे लिए अब तुम्हारी दुनिया में कोई जगह नहीं।
ये 50 लाख तुम्हारा हिस्सा है। हमारी मेहनत, हमारी बचत का आधा।
बाकी आधा मैंने अपने लिए रखा है, ताकि मैं भी बिना बोझ के नई शुरुआत कर सकूँ।
घर, गाड़ियाँ, बैंक बैलेंस—सब बराबर बँट चुका है। अब हमारे बीच सिर्फ यादें रह गई हैं।
अर्जुन,
मैं तुम्हें रोकूँगी नहीं।
रिश्ता जब दिल से टूट जाए तो जबरदस्ती का कोई मतलब नहीं।
तुमने धोखा दिया, लेकिन मैं बद्दुआ नहीं दूँगी।
क्योंकि तुम्हारे जाने से मुझे खुद को पाने का मौका मिला है।”*
— तुम्हारी कभी रही,
मीर
अंतिम सीन
पत्र पढ़ते ही अर्जुन की आँखों से आँसू बह निकले। उसके हाथ काँप रहे थे, और घुटनों पर गिर पड़ा।
“मीरा… मैंने सोचा भी नहीं था कि तुम इतनी मज़बूत हो सकती हो।”
लेकिन मीरा खिड़की के पास खड़ी रही। उसकी आँखों में दर्द था, पर उस दर्द के पीछे एक नयी ताक़त चमक रही थी।
अर्जुन ने रोते हुए उसके पैरों को छूने की कोशिश की,
लेकिन इस बार मीरा ने उसकी ओर देखा तक नहीं।